सोन पापड़ी का सच : दिवाली पर में खाने वाली मिठाई आखिर कहा से आई

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जैसे-जैसे दिवाली पास आती है वैसे ही सोनपापड़ी की खुशबू ही बढ़ती जाती है त्योहारों में भारत में सबसे ज्यादा सोनपापड़ी खाई जाती है

दिवाली के दिनों में हर घर में हंसी मजाक के साथ थहाके उड़ाए जाते हैं और दिलो जान से दोस्तों यारों के साथ दिवाली बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है उसी के साथ मिठाइयां भी आपस में बाटली जाती है उसमें से त्योहारों में प्यारी उतना ही ज्यादा बढ़ता है त्योहारों का असली मतलब ही वही है

सोन पापड़ी खाने में तो बहुत ही स्वादिष्ट है परंतु ऐसे भी लोग हैं जो सोनपापड़ी देखकर अपना मुंह बना लेते हैं और कुछ लोगों के मुंह में सोन पापड़ी देखकर पानी आना शुरू हो जाता है

सच तो यह है कि आपको पसंद हो ना हो त्योहारों में सोन पापड़ी आना एक लाजमी है

भारत में सोन पापड़ी जिसे- सोहन पापड़ी, पतीसा, शोणपापड़ी, सन पापड़ी, शोमपापड़ी के इन नामों से भी बोला जाता हे पहचाना जाता है,

आपको पता हे यह जो सोन पापड़ी हे हमारे यह कहा से आईं इसका निर्माण कहा पर हवा

सोनपापड़ी एक ऐसी मिठाई हे जोकि हमारे हर दिन के खाने जैसे शामिल हो इसके लिये त्योहार की जरूरत ही नहीं पड़ती

यह ऐसी मिठाई है जो साल के 12 ही महीने खाई जाती है इसके लिए कोई भी त्योहार के जरूरत नहीं पड़ती है कौन से भी मौके पर सोनपापड़ी मिठाई खाई जाती है और यह मिठाई कहीं पर भी आसानी से कौन से भी समय में उपलब्ध होती है

“सोन पापड़ी में दूध नहीं होता. बल्कि इसमें बेसन, चीनी और बनती है, जिससे यह छह महीने तक ख़राब नहीं होती है. यही वजह है कि कई बड़े ब्रांड इसे बड़े पैमाने पर देश-विदेश भेजते हैं. यह मोतीचूर लड्डू या काजू कतली की तरह हर मौके़ की मिठाई है.”

खाने की परंपराओं पर शोध करने वाले चिन्मय दामले कहते हैं कि इसका सस्ता होना और बड़े पैमाने पर उत्पादन इसे दिवाली में सबसे ज़्यादा बांटी जाने वाली मिठाई बनाता है, यही वजह है कि लोग इसे ‘हर घर की मिठाई’ कहकर मज़ाक भी उड़ाते हैं.

“पतीसा बनाना कोई खाणे का काम नाही है बहोत ही मुश्किल काम होता है. पतीसा बनने के लिये चीनी की चाशनी को बार-बार पिटना पडता है और फैलाकर इसमें रेशे बनाए जाते थे. यह रेशेदार बनावट ही सोहन पापड़ी को एक अलग रूप देता है और इसमें से सोन पापड़ी बनती है

हमारे बचपन में बुढी के बाल बोला जाता था इस प्रकार से यह सोनपापड़ी का निर्माण और बनाई जाती है हमारे बचपन में सबसे ज्यादा पसंदीदा मिठाइयों में से एक होती थी जो कीसोनपापड़ी

भारत के “पंजाब में बेसन के लड्डू और उसके साथ पतीसा बनता था, जो धीरे-धीरे सोहन पापड़ी में बदल गया. दोनों में एक बात कॉमन है- रेशेदार बनावट और चीनी की मिठास.” के साथ बनती है

प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं, “यहां पर हर चीज़ हिंदुस्तान में बाहर से नहीं आई है. कई चीज़ें भारत में पहले से ही निर्माण है

चिन्मय दामले कहते हैं कि “सोहन पापड़ी का मूल फ़ारस की पश्मक मिठाई से है. पश्मक का मतलब है ‘ऊन जैसा’, जो इसकी रेशेदार बनावट को दर्शाता है. इसका निर्माण साधारण 19वीं सदी में फ़ारसी व्यापारी मुंबई की गलियों में पश्मक बेचते थे. एसएम एडवर्ड्स की किताब ‘बाइ-वेज़ ऑफ बॉम्बे’ में इसका ज़िक्र है. पश्मक में चीनी, ड्राई फ्रूट्स, पिस्ता और इलायची की ख़ुशबू होती थी.”

दामले ‘सोहन’ शब्द को संस्कृत के ‘शोभन’ (सुंदर) से जोड़ते हैं. वह बताते हैं, “मिर्ज़ा ग़ालिब के एक पत्र में ‘सोहन’ का ज़िक्र मिलता है, जिसमें वह बाजरे के हलवे की बात करते हैं.”

चिन्मय दामले सोन पापड़ी का एक संभावित कनेक्शन फ़ारसी सोहन हलवा से भी बताते हैं. उनका कहना है कि यह मिठाई फ़ारस, तुर्किस्तान से होते हुए भारत आई है.

सोहन हलवा और सोहन पापड़ी यह दोनों मिठाईयां अलग-अलग तरख की है

दामले कहते हैं कि “सोहन हलवा गेहूं से बनता है और गाढ़ा होता है, जबकि सोहन पापड़ी बेसन से बनती है और रेशेदार भी होती है. 18वीं सदी में अवध में सोन पापड़ी बनने लगी थी और इसे चार तरह की ‘सोन पापड़ी मिठाइयों में गिना जाता था. 20वीं सदी तक बिहार और बंगाल, ख़ासकर बक्सर में इसकी दुकानें मशहूर थीं.”

एक और बताइए इसका नाम लिया जाता है सौंध हलवा, जो 18वीं सदी में नाइजीरिया से रामपुर आया, लेकिन यह सोन पापड़ी से अलग है

दिवाली के मौक़े पर सोन पापड़ी साथ दिवाली के मौके पर बहुत ही मजे के साथ खाई जाती है

“इसका बड़े पैमाने पर निर्माण किया जाता है . यह सस्ती है और बिना दूध के बनने के कारण लंबे समय तक ख़राब नहीं होती है. यही वजह है कि दिवाली में लोग इसे जमकर बांटते हैं. हर घर में सोहन पापड़ी का डिब्बा पहुंच जाता है, और लोग इसे ‘दिवाली का फ़िक्स्ड गिफ़्ट’ कहकर मज़ाक बनाते हैं.

सोन पापड़ी की कहानी इसे दुनिया के दो हिस्सों से जोड़ती है. पुष्पेश पंत इसे भारत में पंजाब के पतीसा से जोड़ते हैं, वहीं चिन्मय दामले इसका संबंध फ़ारस की पश्मक मिठाई से बताते हैं.

लेकिन दोनों इस बात पर सहमत हैं कि इसके बारीक रेशे और मुंह में घुलने वाला स्वाद इसे अनोखा बनाते हैं.

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