देश और दुनिया को भुखमरी से बचाने वाले वैज्ञानिक: एम. एस. स्वामीनाथन

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हरित क्रांति के असली जनक

साल 1965 था। रविवार का दिन।
दिल्ली के पास जैटी इलाके के एक छोटे से गाँव में एक मेहनती किसान ने कृषि क्षेत्र में काम करने वाले एक वैज्ञानिक की ओर हाथ बढ़ाया और कहा,
“डॉक्टर साहब, हम आपका बीज इस्तेमाल करेंगे।”

वो वैज्ञानिक थे — डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन।
बाद में विश्वप्रसिद्ध टाइम मैगज़ीन ने उन्हें “हरित क्रांति के गॉडफादर” की उपाधि दी।
साथ ही, रवींद्रनाथ टैगोर के साथ उन्हें 20वीं सदी के भारत के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में गिना जाने लगा।

जब उन्होंने किसान से पूछा —
“तुम ज्यादा उपज देने वाली गेहूं की इस नई किस्म को अपनाने के लिए क्यों तैयार हुए?”
तो किसान ने जवाब दिया —
“जो व्यक्ति रविवार को इस खेत से उस खेत तक जाता है, वह अपने लाभ के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांतों के लिए काम करता है। ऐसे व्यक्ति पर भरोसा करना ही काफी है।”

उस किसान का यह विश्वास भारत के भविष्य को बदल देने वाला साबित हुआ।

यहाँ तक कि प्रियंबदा जयकुमार ने स्वामीनाथन पर “द मैन हू फेड इंडिया” नामक जीवनी भी लिखी।
उन्होंने लिखा कि स्वामीनाथन का जीवन भारत के खाद्य आत्मनिर्भरता की असली कहानी है।
उनकी मेहनत ने न सिर्फ भारत बल्कि पूरे एशिया में खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण को बदल दिया।

कई वर्षों की औपनिवेशिक नीतियों ने भारत की कृषि को बुरी तरह प्रभावित किया था।
कम उत्पादन, बंजर ज़मीनें और कर्ज़ में डूबे करोड़ों किसान — ये सभी देश की कृषि क्षेत्र की गंभीर समस्याएँ थीं।

स्वामीनाथन की पहल से अधिक उत्पादन देने वाली गेहूं की किस्मों ने पंजाब और हरियाणा को उत्तर भारत का “धान्य कोष” बना दिया।
1960 के दशक के मध्य तक एक भारतीय व्यक्ति औसतन रोज़ केवल 417 ग्राम भोजन पर जीता था।

भारत को उस समय अमेरिका से गेहूं आयात करना पड़ता था।
देश पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर था।
स्थिति इतनी भयावह थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लोगों से गेहूं की जगह शकरकंद (रतालू) खाने की अपील करनी पड़ी।
चावल जैसी मुख्य खाद्य वस्तुओं की भी भारी कमी थी।

हरित क्रांति के बाद बंजर खेत हरे-भरे खेतों में बदल गए।
कुछ ही वर्षों में गेहूं का उत्पादन दोगुना हो गया।
भुखमरी से जूझता भारत, एशिया की खाद्य शक्ति बन गया।

बंगाल के अकाल का प्रभाव

1925 में तमिलनाडु के कुंभकोणम में स्वामीनाथन का जन्म हुआ।
उनका परिवार समृद्ध किसान था।
घर में शिक्षा और सेवा को महत्व दिया जाता था।
परिवार को उम्मीद थी कि वे डॉक्टर बनेंगे।

लेकिन 1943 के बंगाल के भयंकर अकाल ने उनका जीवन बदल दिया।
तीस लाख से अधिक लोग उस अकाल में मारे गए।
इस भीषण स्थिति ने युवा स्वामीनाथन को झकझोर दिया।

उन्होंने अपनी जीवनी में प्रियंबदा जयकुमार से कहा —
“मैंने निश्चय किया कि मैं एक ऐसा वैज्ञानिक बनूंगा जो अच्छी फसलें विकसित करेगा ताकि कोई भूखा न मरे।
दवाएँ कुछ लोगों की जान बचा सकती हैं, लेकिन खेती लाखों लोगों का जीवन बचा सकती है।”

उन्होंने प्लांट जेनेटिक्स में पीएचडी की, कैम्ब्रिज में पढ़ाई की और फिर नीदरलैंड्स व फिलिपींस के अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (IRRI) में काम किया।

बाद में मेक्सिको में अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक और नोबेल पुरस्कार विजेता नॉर्मन बोरलॉग से मुलाकात हुई।
उनके छोटे आकार के, अधिक उत्पादन देने वाले गेहूं के बीज हरित क्रांति की नींव बने।

1963 में स्वामीनाथन ने बोरलॉग को भारत के लिए गेहूं की उन्नत किस्में भेजने के लिए तैयार किया।
तीन साल बाद भारत ने 18,000 टन बीज आयात किए और उन्हें देशभर में प्रयोगात्मक रूप से बोया गया।

स्वामीनाथन ने इन बीजों में भारत की जलवायु के अनुरूप बदलाव किए और ऐसी किस्में तैयार कीं जो दोगुना-तीन गुना उत्पादन देती थीं।
साथ ही ये रोगों और कीटों के प्रति अधिक सहनशील थीं।

किसानों को समझाना था मुश्किल

प्रियंबदा जयकुमार लिखती हैं —
“उस समय विदेशी बीजों पर भरोसा करना आसान नहीं था।
अधिकारी भी झिझकते थे, परिवहन और सीमा शुल्क की दिक्कतें थीं।
किसान पारंपरिक किस्म छोड़ने को तैयार नहीं थे।”

स्वामीनाथन ने यह चुनौती स्वीकार की।
वे खुद खेतों में जाते, किसानों से बातें करते, आँकड़े दिखाते और बीज बाँटते।

उन्होंने पंजाब में जेल के कैदियों से बीज पैकेट तैयार करवाए, ताकि बुआई के मौसम में समय पर वितरण हो सके।

मेक्सिकन गेहूं छोटा और लाल था,
लेकिन स्वामीनाथन ने भारतीय रोटी-चपाती की पसंद को ध्यान में रखते हुए सुनहरी किस्में — “कल्याण सोना” और “सोनालिका” विकसित कीं।

चार वर्षों में यह एक चमत्कार बन गया।
भारत खाद्य संकट से निकलकर आत्मनिर्भर बन गया।

1971 तक, यानी केवल चार सालों में, भारत में अन्न का अधिशेष उत्पादन होने लगा।
दुष्काल से जूझता देश अन्न का निर्यातक बनने की राह पर था।

“शेत ही प्रयोगशाला है” — स्वामीनाथन

उनका सिद्धांत था — “पहले किसान।”
वे कहते थे —
“क्या तुम जानते हो, खेत भी एक प्रयोगशाला है?
और किसान असली वैज्ञानिक हैं, जिन्हें हमसे ज्यादा ज्ञान है।”

वे हर सप्ताह गाँवों में जाते, किसानों से मिट्टी, नमी, बीज और कीटों के बारे में चर्चा करते।

ओडिशा में उन्होंने आदिवासी महिलाओं के साथ काम कर नई धान किस्में विकसित कीं।
तमिलनाडु के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में नमक-सहिष्णु पौधों को बढ़ावा दिया।

वे कहते थे —
“विज्ञान के साथ करुणा भी होनी चाहिए, तभी भूख मिटेगी।”

2004 से 2006 तक वे राष्ट्रीय किसान आयोग के अध्यक्ष रहे।
उन्होंने पाँच प्रमुख रिपोर्टें तैयार कीं, जिनमें किसानों की आत्महत्याओं और कृषि संकट के कारणों का विश्लेषण किया गया था।

वो हमेशा किसानों के साथ खड़े रहे —
यहाँ तक कि 98 वर्ष की आयु में भी उन्होंने पंजाब-हरियाणा के आंदोलनकारी किसानों का समर्थन किया।

वैश्विक प्रभाव

1980 के दशक में वे IRRI के पहले भारतीय महानिदेशक बने।
उनकी पहल से इंडोनेशिया, वियतनाम और फिलीपींस में धान की पैदावार बढ़ी।
उन्होंने मलेशिया से लेकर ईरान, मिस्र से तंज़ानिया तक कई देशों की सरकारों को मार्गदर्शन दिया।

कंबोडिया को धान की “जीन बैंक” पुनर्स्थापित करने में मदद की,
उत्तर कोरिया की महिला किसानों को प्रशिक्षण दिया,
और इथियोपिया के अकाल में अफ्रीकी कृषि वैज्ञानिकों की सहायता की।

1987 में उन्हें विश्व खाद्य पुरस्कार (World Food Prize) का पहला विजेता चुना गया।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने उन्हें “लिविंग लीजेंड” कहा।

उन्होंने चेन्नई में एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन स्थापित किया —
जहाँ उन्होंने जैव विविधता, तटीय पुनर्निर्माण और “गरीब, महिला और प्रकृति” आधारित विकास मॉडल को प्रोत्साहित किया।

हरित क्रांति से ‘एवरग्रीन क्रांति’ तक

हरित क्रांति की सफलता के साथ कुछ नकारात्मक परिणाम भी आए —
भूजल स्तर गिर गया,
मिट्टी की गुणवत्ता घटी,
और रासायनिक कीटनाशकों से प्रदूषण बढ़ा।

स्वामीनाथन ने यह खतरा समय रहते पहचान लिया।
1990 में उन्होंने “एवरग्रीन रिवॉल्यूशन” की संकल्पना दी —
ऐसी हरित क्रांति जिसमें पर्यावरण को नुकसान न हो।

उन्होंने कहा —
“भविष्य की प्रगति खाद पर नहीं,
बल्कि पानी, मिट्टी और बीज की सुरक्षा पर निर्भर करेगी।”

वे ऐसे दुर्लभ व्यक्ति थे जिन्होंने आँकड़ों को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ा।

1971 में उन्हें रमन मैगसेसे पुरस्कार मिला।
उन्होंने इसकी धनराशि का बड़ा हिस्सा ग्रामीण छात्रवृत्तियों के लिए दान कर दिया।

बाद में उन्होंने लैंगिक समानता और डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा दिया —
उस समय जब “एग्री-टेक” शब्द भी प्रचलन में नहीं था।

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने कहा था —

> “स्वामीनाथन की विरासत हमें याद दिलाती है कि भुखमरी से मुक्ति ही सबसे बड़ा स्वतंत्रता है।”

स्वामीनाथन ने विज्ञान और करुणा का संगम कर
करोड़ों लोगों को यही स्वतंत्रता दी।

साल 2023 में 98 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।
परंतु उनका योगदान आज भी किसानों की हितैषी, टिकाऊ और संवेदनशील कृषि का जीवंत प्रतीक है।

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