फलटण महिला डॉक्टर आत्महत्या प्रकरण : महिला आयोग से क्या अपेक्षा थी और वास्तव में क्या हुआ?

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फलटण की महिला डॉक्टर आत्महत्या मामले में महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चाकणकर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की थी। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में जांच से जुड़ी जानकारी साझा करते हुए उन्होंने कुछ बयान दिए, जिन पर कई लोगों ने आपत्ति जताई है।

हाल ही में शिवसेना की नेत्री सुषमा अंधारे ने रूपाली चाकणकर से इस्तीफे की मांग की है, जबकि सामाजिक कार्यकर्ता अधिवक्ता वर्षा देशपांडे ने सीधे अदालत का रुख करने का निर्णय लिया है।

अब सवाल उठता है कि—आख़िर क्या आपत्तियां हैं? रूपाली चाकणकर ने क्या कहा? और क्या इस पूरे मामले में आरोपियों को “क्लीन चिट” देने की कोशिश की जा रही है?

शिकायत की शुरुआत

बीड ज़िले के एक किसान परिवार में जन्मी इस युवती के पिता किसान हैं, जो छोटे जोत के किसान हैं। परिवार ने अपनी बेटी की पढ़ाई पूरी तरह खेती की आय से करवाई। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह डॉक्टर बनी और सातारा ज़िले के फलटण के उपजिला अस्पताल में चिकित्साधिकारी (Medical Officer) के रूप में कार्यरत थीं।

23 सितंबर को इस महिला डॉक्टर ने फलटण के एक होटल में जाकर आत्महत्या कर ली।

डॉक्टर के हाथ पर लिखे सुसाइड नोट में दो नाम दर्ज थे—पीएसआई गोपाल बदने और प्रशांत बनकर।

नोट में लिखा था कि गोपाल बदने ने चार बार बलात्कार किया था और प्रशांत बनकर ने मानसिक व शारीरिक शोषण किया था।

दोनों में से बनकर को पुलिस ने गिरफ्तार किया, जबकि बदने ने बाद में आत्मसमर्पण किया।

पहले की गई शिकायतें

डॉक्टर ने वरिष्ठ अधिकारियों से अपने उत्पीड़न की शिकायत की थी।
19 जून को फलटण के उप-अधीक्षक के पास दी गई शिकायत में लिखा था कि आरोपी का रिपोर्ट तैयार करने के लिए पुलिस प्रशासन दबाव बना रहा है।

पुलिस अधिकारी अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते थे। वरिष्ठों को बताने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई।

शिकायत में पीएसआई गोपाल बदने का नाम भी दर्ज था।

इसके बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो डॉक्टर ने 13 अगस्त को RTI (सूचना का अधिकार) के तहत जानकारी मांगी।

डॉक्टर ने यह भी कहा था कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट गलत बनाने के लिए राजनीतिक दबाव था, और सांसद के पीए के फोन आते थे कि रिपोर्ट “ख़ास तरीके से” बनाएं।

डॉक्टर के परिवार का कहना है कि हाथ पर लिखा नोट उनके हाथ का नहीं है।

उनके परिवार ने कहा — “हमारी बेटी को न्याय मिल पाएगा या नहीं, कहना मुश्किल है। जिन्होंने इतना अत्याचार किया, उन्हें फांसी होनी चाहिए।”

राज्य महिला आयोग की भूमिका

17 अक्टूबर को राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा रूपाली चाकणकर फलटण पहुंचीं और घटनास्थल का दौरा किया।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा —
पुलिस ने डॉक्टर, गोपाल बदने और प्रशांत बनकर के सीडीआर (कॉल डिटेल रिकॉर्ड) निकाले हैं।

जनवरी से मार्च तक गोपाल बदने से बातचीत हुई थी, पर बाद में नहीं।
डॉक्टर और बनकर के बीच संपर्क रहा था।

चाकणकर ने कहा —
डॉक्टर लक्ष्मीपूजन के दिन बनकर के घर गई थीं, वहां दोनों में झगड़ा हुआ।
डॉक्टर मंदिर चली गईं, फिर बनकर के पिता ने उन्हें समझाया और घर लाया।

बनकर का मोबाइल बंद था, इसी कारण विवाद हुआ।
डॉक्टर ने आत्महत्या की धमकी का मैसेज और फोटो बनकर को भेजा था।

चाकणकर ने कहा — “पूर्व सांसद रणजीतसिंह नाईक-निंबालकर का इस प्रकरण से कोई सीधा या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है।”

उन्होंने बताया कि डॉक्टर की पोस्टिंग फलटण में विशेष आदेश से की गई थी, क्योंकि वहीं रहने की डॉक्टर की इच्छा थी।

परिवार की प्रतिक्रिया

डॉक्टर के भाई ने कहा —
“रूपाली चाकणकर की भूमिका अत्यंत गलत है। उन्हें हमारे घर आकर हमारी बात सुननी चाहिए थी, सांत्वना देनी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने आरोपियों का पक्ष लिया। महिला आयोग की अध्यक्ष होकर भी वे पीड़िता के खिलाफ बोल रही हैं।”

गांववालों और पीड़िता के परिवार ने चाकणकर के राजीनामे की मांग की है।

सुषमा अंधारे की टीका

शिवसेना की नेत्या सुषमा अंधारे ने कहा —
रूपाली चाकणकर को पद से इस्तीफा देना चाहिए।

उनका कहना है —
महिला आयोग का काम महिलाओं का सशक्तिकरण है। अगर किसी महिला के साथ अन्याय हो रहा है, तो आयोग को उसके पक्ष में खड़ा होना चाहिए, न कि आरोपी के पक्ष में।

रूपाली चाकणकर को जांच के बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक करने का अधिकार नहीं है।
उन्होंने पीड़िता के चैट और कॉल डिटेल बताई, लेकिन आरोपी की नहीं — यह पक्षपात है।

सुषमा अंधारे ने कहा —
“आपको किसी महिला के चरित्र पर उंगली उठाने का हक़ नहीं है। आपकी बातों से आरोपी को राहत मिल रही है।”

अजित पवार की भूमिका

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष व उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने डॉक्टर के परिवार से फोन पर बात की।

उन्होंने कहा —
“मैं हमेशा न्याय के पक्ष में हूं। आपकी बेटी को न्याय मिले, इसके लिए मैं आपके साथ हूं। रूपाली चाकणकर के बयानों से मैं सहमत नहीं हूं।”

महिला आयोग का वास्तविक कार्य क्या है?

महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग की स्थापना 1993 में “महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग अधिनियम” के तहत की गई।

इसका उद्देश्य है —

  • समाज में महिलाओं की गरिमा बढ़ाना।
  • महिलाओं का अपमान करने वाले मामलों का संज्ञान लेना और निवारक कदम उठाना।
  • महिलाओं से जुड़े कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना।

जरूरतमंद महिलाओं को परामर्श और कानूनी सहायता देना।

  • समाज में महिलाओं के उत्थान के लिए सरकार को सिफारिशें देना।
  • जनजागृति और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना।
  • कानून के अनुसार आयोग के पास यह अधिकार है कि —
  • किसी व्यक्ति को उपस्थित होने के लिए समन भेज सके।
  • दस्तावेज़ या रेकॉर्ड मंगवा सके।
  • किसी भी सरकारी विभाग से आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सके।

फलटण महिला डॉक्टर आत्महत्या प्रकरण में महिला आयोग से यह अपेक्षा थी कि वह पीड़िता के परिवार की बात सुने, निष्पक्ष जांच की सिफारिश करे, और महिला के सम्मान की रक्षा करे।

लेकिन रूपाली चाकणकर के बयान के बाद आरोप लगे कि उन्होंने पीड़िता की बजाय आरोपी का पक्ष लिया, जिससे विवाद और गहराया।

अब इस प्रकरण में न्यायालय, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक दल—सभी इस मामले पर नज़र रखे हुए हैं।

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