भारत का विश्व-कप विजय और मध्यरात्रि की नई सुबह, अनगिनत पंखों को नई उड़ान मिल गई।
जब हरमनप्रीत कौर ने अपनी टीम के साथ विश्व-कप उठाया, तो वह सिर्फ एक विश्व विजयी पल नहीं था। उस क्षण में अनेक लोगों की सपने साकार हुए और अनगिनत पंखों को नई ताकत मिली।
ठीक मध्यरात्रि में—जब आमतौर पर सारा संसार सोया होता है—भारत में फिर एक नई सुबह की शुरुआत हुई है।
असल में, इस सुबह के उज्जवल होने से पहले रात के अँधेरे में इन लड़कियों ने यात्रा की। कभी ठोकरें खाईं, कभी आशा की किरण बनकर चलती रहीं।

“लड़कियों को क्रिकेट कुछ नहीं आता” से लेकर “लड़कियाँ क्रिकेट में विश्व विजेता बनीं” तक यह यात्रा है। कहें तो वर्षों-दशकों की, कहें तो अनेक शताब्दियों की।
काँटे भरी राहों से होते हुए ये यहाँ तक पहुँची हैं। कभी एक-दूसरे का सहारा बनीं, एक-दूसरे की तारीफ की और कभी-कभी एक-दूसरे के साथ आँसू बहाए।
कभी एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को कंधे पर उठाकर आगे बढ़ाया और किसी ने किसी का हाथ थामकर अगले रास्ते का पथप्रदर्शन किया।
शायद इसलिए जब हरमनप्रीत की टीम ने वह क्षण मनाया, तब रीना मल्होत्रा, अंजुम चोप्रा, मिताली राज, झूलन गोस्वामी जैसे पूर्वसूरियों के साथ भी उतना ही उमंग से जश्न मनाया गया।
क्रिकेट में ऐसी कई महिलाओं ने जो नींव रखी थी, उसी पर आज हरमनप्रीत, स्मृती मंधाना, जेमिमा रॉड्रिक्स, दिप्ती शर्मा, शेफाली वर्मा ने इमारत खड़ी की है।

और जाहिर है, इस इमारत को बनाते-बनाते उन्हें हर ईंट-पत्थर खुद हाथों से तैयार करना पड़ा है।
राधा यादव का उदाहरण ही ले लीजिए। उनके पिता ओमप्रकाश यादव उत्तर प्रदेश से मुंबई आए और दूध-भाजी का छोटा स्टॉल चलाने लगे थे। रोज़ दो वक्त का खाना मिलना भी मुश्किल था। सातवें महीने में जन्मी राधा के बचने की भी डॉक्टरों को शंका थी। स्कूल में उनकी माँ को अंग्रेजी न आने के कारण प्रवेश तक नहीं मिला था।
फिर भी राधा ने क्रिकेट खेलने का सपना नहीं छोड़ा। समय आने पर पूरा परिवार इस लड़की के पीछे खड़ा हुआ। उनकी बड़ी बहन भी क्रिकेट खेलती थी, लेकिन राधा के लिए उसने खुद त्याग किया। आज वही राधा भारत के लिए 2018 से गेंदबाजी कर रही हैं। फिर भी किसी ने हालही में उनसे पूछा था – राधा कौन है?
क्योंकि जितनीता से भारत में पुरुषों का क्रिकेट देखा जाता है, उतना ध्यान महिला खिलाड़ियों को कभी नहीं मिलता था। लेकिन अब यह तस्वीर इस विश्व-कप के बाद बदलती नजर आने लगी है, यह उम्मीद है।

केवल राधा ही नहीं, बल्कि प्रत्येक की राह में संघर्ष था। फाइनल की हीरो शेफाली वर्मा ने खेलने के लिए बाल कटवाए, लड़के समझकर उनके साथ ही खेलना पड़ा था।
भारत की कप्तान हरमनप्रीत कौर, यानी भारतीय टीम की युवा खिलाड़ियों की चहेती ‘हैरी दी’, एक-वक़्त पंजाब के मोंगा शहर में दुपट्टा पहनकर स्कूल के मैदान में लड़कों के साथ क्रिकेट खेलती थीं।
हरमन को खेलने का अवसर उनके पिता का सपना था, जो खुद एक खिलाड़ी थे। आगे डायना एडलजी के पहल पर उन्हें पश्चिम रेलवे में नौकरी और मुंबई में रहने का अवसर मिला।
महिला खिलाड़ियों को आगे लाने की दिशा में यह एक प्रयास था, जो सफल हुआ।
हरमनप्रीत और शेफाली जैसे अनेक खिलाड़ियों को कभी अकेले तो कभी लड़कों के साथ अभ्यास करना पड़ा है और अपनी राह खुद तलाशनी पड़ी है।
आज 2025 में भारत के बड़े शहरों में लड़के-लड़कियाँ साथ-साथ खेलते हैं, यह बात बड़ी नहीं लगती। लेकिन भारत के कई राज्यों के छोटे शहरों-गाँवों में आज भी किशोर लड़के-लड़कियाँ खेलते देखना लोगों को हजम नहीं होता।
मुंबई में भी कई जगह लड़कियाँ मैदान में उतरकर आसानी से क्रिकेट खेलती हैं — यह 16-17 वर्ष पहले तक बहुत ज्यादा दिखता नहीं था।

मुंबई के MIG Club में 2009-10 के दौरान जेमिमा रॉड्रिक्स का अभ्यास हुआ था, और वहाँ खेलने की अनुमति पहली महिला क्रिकेटर को ही मिली थी।
मुंबई क्रिकेट में आज जेमिमा सबसे बड़ी स्टार है। लेकिन अधिकांश महिला खिलाड़ियों के भाग्य में जो चुनौतियाँ आईं, वे जेमिमा के हिस्से में भी आईं। कभी उनके खेल की बजाय उनकी शोभा, गाना या इंस्टाग्राम-पर मौजूदगी चर्चित हुई। कभी उन्हें भारी ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा।
2024 में जेमिमा के पिताजी द्वारा हार जिमखाना में आयोजित कार्यक्रमों के कारण विवाद हुआ था। उस पर सोशल-मीडिया में काफी चर्चा हुई थी।
लेकिन रील्स के साथ-साथ रन भी कर सकते हैं, यह जेमिमा ने फिर से साबित किया। पिछले विश्व-कप में टीम से बाहर होने के बाद जेमिमाने इस विश्व-कप में भारत को फाइनल की टिकट दिलाई।
भारत की ऑल-राउंडर अमनजोत कौर के पिता मोहाली में सुतार का काम करते थे, और उन्होंने बेटी के क्रिकेट खेलने पर रिश्तेदारों की बातों को भी झेना है।
अमनजोत हो, प्रतिका रावल हो, ऋचा घोष हो या क्रांति गौड या श्रीचरणी – और इन जैसी कई-सी लड़कियाँ।
परिवार का और उन प्रशिक्षकों का साथ जिन्होंने “लड़कियाँ खेल सकती हैं” इस विश्वास पर काम किया, इनकी प्रत्येक यात्रा में महत्वपूर्ण था।

कहते हैं कि भारतीय महिलाओं में गुणवत्ता की कमी नहीं है — उन्हें सिर्फ एक मौका मिलना चाहिए।
दीप्ती शर्मा की कहानी यही कहती है। वह छोटी थी, भाई के साथ एक स्थानीय मैच देखने गई थी, गेंद उनके पास आई, उन्होंने फेंका, वह 50 मीटर दूर स्टंप पर लगी। उस समय हेमलता काला ने यह देखा और उन्हें खेलने का सुझाव दिया। नववर्ष में दीप्ती ने खेलने की शुरुआत की और अब उनकी गेंदबाजी ने भारत के विश्व-कप विजय में शिक्का लगाया।
क्रिकेट में कई बार लड़कियों का संघर्ष हमें शुरुआत से ही दिखता है — एक अच्छे क्रिकेट किट से लेकर शुरुआत तक।
सांगली की स्मृती मंधाना ने जब भाई को देखकर क्रिकेट खेलना शुरू किया, तो उनकी माँ ने भाई की जर्सी से उनके माप के कपड़े सिलवाए थे।
सुविधाओं की कमी और अवसरों की कमी – यह महिलाओं के खेलों और खासकर क्रिकेट में एक बड़ी बाधा रही है। भारत की पहली महिला कप्तान शांता रंगास्वामी ने एक इंटरव्यू में इसी बात का जिक्र किया था कि उनके समय में 1970-80 के दशक में भारतीय महिला क्रिकेटर्स कभी भीड़भाड़ वाली ट्रेन में यात्रा करती थीं और समय पर नहीं मिल पाया तो एक डॉरमिटरी में जमीन पर सोना पड़ता था।
उनके समय में महिला क्रिकेट संघाना बीसीसीआय से अलग थी। प्रायोजकों की कमी थी और पैसे की कमी भी।
लेकिन जब महिला क्रिकेट को ICC के अंतर्गत लाया गया, तब भारत की महिला टीम भी बीसीसीआय के अधीन आयी, आर्थिक-स्तर पर और खेल के प्रसार में भी बदलाव आने लगे।

10-12 साल पहले तक कई भारतीय महिला खिलाड़ियों के नाम भी अधिकांश लोगों को नहीं पता थे। अब खेल में खेलती-लिखित-बोली जाने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ी है, और लोगों तक उनकी जानकारी भी पहुँचने लगी है।
क्रिकेट में मैटरनिटी लीव जैसे नीतियों के लिए न्यूज़ीलैंड और पाकिस्तान जैसे क्रिकेट बोर्ड ने पहल की है, और भारत में भी इसके लिए प्रयास हो रहे हैं।
असल बात यह है—आज महिला क्रिकेट ने सिर्फ क्रिकेट के अंदर नहीं बल्कि महिलाओं के जीवन की कई-कई बातें उजागर की हैं।
पिछले तीन वर्षों में भारत में पुरुषों की तरह ही महिलाओं की लीग WPL की शुरुआत हुई है। उस से पहले ऑस्ट्रेलिया की W BBL महिला क्रिकेट में सबसे आकर्षक स्पर्धा बनी थी। WPL ने बड़ी-बड़ी पुरस्कार राशि के साथ अनेकाओं को अवसर दिए हैं और उन में से नयी-नयी लड़कियों की गुणवत्ता सामने आ रही है।
भारत जैसे क्रिकेट-प्रभावशाली देश में यह बदलाव दूरगामी असर रख सकते हैं।
बेशक एक सच्चाई भूलना नहीं चाहिए—आज भी भारत के कई गाँवों में और अन्य देशों में महिला क्रिकेटर्स की राह कठिन है।
भारत के समान दक्षिण अफ्रीका की टीम की महिलाओं को भी बड़े व्यक्तिगत संघर्ष से गुजरना पड़ा है। अफ़गानिस्तान में तो महिलाओं को सिर्फ इसलिए कि वे महिलाएं हैं, खेलने की अनुमति तक नहीं मिली है।
तो भी अब समय बदल रहा है। विशेष रूप से 2017 के वर्ल्ड कप में भारतीय महिलाओं ने फाइनल को छुआ था, उसके बाद से बदलाव की चक्की और तेज़ घूमने लगी है, और अब इस वर्ल्ड कप की जीत के बाद भारत में महिला क्रिकेट की गाड़ी फुल-स्पीड से चलने वाली है, इस विश्वास का आधार बन चुकी है।
इसलिए जब हरमनप्रीत ने विश्व-कप उठाया, वह केवल एक विश्व-विजय का पल नहीं था। बल्कि उस क्षण से सिर्फ भारत में महिला क्रिकेट नहीं बदली, बल्कि महिला क्रिकेट का संसार ही बदलने की शुरुआत हो सकती है।
